होली—प्रेम, परंपरा और ज़िम्मेदारी
शोर नहीं, जुड़ाव—यही असली उत्सव
होली की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ।
आइए इस होली को बिल्कुल सहज भाव से मनाएँ—जैसे पानी से प्यास बुझती है और भोजन से भूख मिटती है; बिना दिखावे और बिना अनावश्यक शोर के।
होली हमारा एक प्रमुख पर्व है, जिसे रंगों, प्रेम और वसंत के उत्सव के रूप में जाना जाता है। यह राधा–कृष्ण के दिव्य प्रेम की याद दिलाती है और साथ ही असत्य व अन्याय पर सत्य और अच्छाई की विजय का संदेश देती है, जैसा कि नरसिंह अवतार और हिरण्यकशिपु की कथा में दिखाई देता है। यह पर्व वसंत के आगमन, शीत ऋतु के अंत, नए उत्साह और नवजीवन का प्रतीक है, तथा अच्छी फसल और समृद्धि की कामना भी इससे जुड़ी है। भारतीय उपमहाद्वीप से जन्मी होली आज भारतीय प्रवासी समुदाय के कारण दुनिया के कई हिस्सों में मनाई जाती है—एक रात और एक दिन तक, फाल्गुन मास की पूर्णिमा से आरंभ होकर।
इस होली, हम सबको आपस में जुड़कर कुछ बेहतर करने का संकल्प लेना है। भारत में एक अति-विशेष प्राणी समुदाय भी है, जो दिन-रात भारत बदलने की बातें करता है—पर बदलते हैं सिर्फ बयान। उन्हें करने दीजिए; आखिर इसी बहाने उनकी रोज़ी-रोटी चलती है। कभी चाटुकारिता, कभी कानों में फुसफुसाहट, और जब कुछ हाथ न लगे तो बिना आधार के आरोप—काम उनका नहीं, पर धंधा पूरे ज़ोर-शोर से चलता रहता है। और हाँ, होली में गिरगिटिया रंग खेलने वालों से थोड़ा फ़ासला बनाए रखें। उन्हें प्यार से समझाइए कि रंग खेलने से पहले दिमाग़ पर चढ़े रंग भी ज़रा धो लेने चाहिए। दिखावे की क्रांति से देश नहीं बदलता; देश बदलता है जब नागरिक अपने गाँव और मोहल्ले की ज़िम्मेदारी उठाते हैं। आजकल कुछ विशेष प्राणी हर विषय के सबसे बड़े विशेषज्ञ बन बैठे हैं, जबकि उस विषय से उनका दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं होता। इन तथाकथित विशेषज्ञों से पूछा जाना चाहिए—आपने आख़िरी बार किया क्या था?
इस होली, दिखावे और अनावश्यक ज्ञान से दूर रहें — लोगों से जुड़ें और आपसी एकता को मज़बूत करें। जो वास्तविक काम से दूर हैं, वे बातों में अव्वल रहते हैं—उन्हें बोलने दीजिए, वही उनका योगदान है।
इस होली, आइए अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभाते हुए एक-दूसरे से जुड़े रहें, आपसी दूरियाँ मिटाएँ और बिखरे रिश्तों में फिर से अपनत्व के रंग भरें। समाज और देशहित के लिए निस्वार्थ भाव से आगे बढ़ते हुए, हमारे विचार, कर्म और संवेदनाएँ एक-दूसरे का सहारा बनें।
अपनत्व के रंग केवल चेहरे पर नहीं, बल्कि मन, रिश्तों और स्मृतियों में भी उतरें। हैप्पी होली!
इस संवाद के लेखक:
Shri Kamlakant Pathak
Associate Director, Pragya

